मन ना रँगाए, रँगाए जोगी कपड़ा [Man na rangae, rangae jogee kapada] (हिंदी काव्य) IGNOU MHD - 01 Free Solved Assignment

मन ना रँगाए, रँगाए जोगी कपड़ा 
[Man na rangae, rangae jogee kapada] (हिंदी काव्य)
 IGNOU MHD - 01 Free Solved Assignment 

निम्नलिखित काव्यांश की संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए ।     

मन ना रँगाए, रँगाए जोगी कपड़ा ।

आसन मारि मंदिर में बैठे

ब्रम्ह-छाँड़ि पूजन लगे पथरा ।।

कनवा फड़ाय जटवा बढ़ौले

दाढ़ी बाढ़ाय जोगी होई गेलें बकरा ।।

जंगल जाये जोगी धुनिया रमौले

काम जराए जोगी होए गैले हिजड़ा ।।

मथवा मुड़ाय जोगी कपड़ो रंगौले

गीता बाँच के होय गैले लबरा ।।

कहहिं कबीर सुनो भाई साधो

जम दरवजवा बाँधल जैबे पकड़ा ।।

प्रसंग:

प्रस्तुत  पद्यांश  हमारी पाठ्यपुस्तक हिंदी काव्य -1 के खंड दो से अवतरित हैं । इसके रचयिता निर्गुण भक्ति शाखा के सम्राट समाज सुधारक  निर्भीकवर्ता , हिंदू - मुस्लिम  एकता के समर्थक एवं भाषा के डिक्टेटर संत कबीर दास जी हैं ।

संदर्भ:

प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने हिंदू - मुस्लिम संप्रदाय के कर्मकांड का भंडाफोड़ किया है , तथा साधना संबंधी झूठे आडंम्बरों और बाह्यचारों पर तीखा व्यंग किया है । मन की एकाग्रता पवित्रता का संदेश दिया है ।

व्याख्या:

कबीरदास जी झूठे आडम्बरो और   बाह्यचारों का खंडन करते हुए आज के हिंदू - मुस्लिम संतो से कहते हैं कि वे भगवान के ठेकेदारों कपड़े रंगने से भगवान की प्राप्ति नहीं होती बल्कि भक्ति मन की पवित्रता और एकाग्रता में निहित होती है । आज के संत और फकीर  बाह्य - आडम्बरो  द्वारा ठगते और गुमराह करते हैं । वे मंदिर में  आसन मार कर बैठ जाते हैं । ब्रह्म या परमात्मा के नाम को छोड़कर  मूर्ति पूजा में अपना समय और शक्ति लगाते हैं ।

कान को फाड़कर  कुंडल पहनते हैं । जटा और दाढ़ी बढ़ा लेते हैं और बकरे की भॉंति अपने पथ से विमुख हो जाते हैं । वे घर  द्वार छोड़कर जंगल में जाते हैं । धुनिया रमाते  हैं और वे कामकाज त्याग कर हिजड़ा जैसे बन जाते हैं , जो किसी भी व्यवसाय में उपयुक्त नहीं समझा जाता है । वे अपना सिर मुरा लेते हैं ।

अपने  कपड़े को जोगिया रंग में रंग लेते हैं । गीता , रामायण , महाभारत जैसो के झूठे उपदेशों को देकर समाज को पथभ्रष्ट करते हैं । इस प्रकार वे अपने कर्तव्य से विमुख  होकर अपनी जीविका में लग जाते हैं।

कबीर के अनुसार:

"कबीरा गुरु के मिलन की बात सुनी हम दोय ।
कै साहब का नाम लै कै कर ऊंचा होय "।।

कबीर कर्मकांड के कट्टर विरोधी थे । वे  भारतीय समाज में प्रचलित आडंबरों , अंधविश्वासों , लोक - अचारों , जॉंति - पात के कट्टर विरोधी थे । वे  मानवतावादी थे । वे संतोष और समानता में विश्वास रखते थे । उनके अनुसार वे साहब मिले सबूरी में विश्वास रखते थे । वे ब्राह्मणवादी पंडितों , मुल्ला और मौलवियों के आडंबरपूर्ण जीवन से नफरत करते थे ।

विशेष:

अंततः कबीर सांसारिक जीवन के अंतर्गत ऐसे व्यक्ति को ही सच्चा मानते हैं और साधना मार्ग के लिए योग्य मानते हैं जो अपने सहज जीवन में  मूल्यों को अपनाता है । संतोष के साथ भाव स्तर पर जीवन व्यतीत करता है उसकी कथनी और करनी में अंतर नहीं होता और वह निरंतर सत्य के मार्ग पर आगे बढ़ता है । 

भाषा शैली:

प्रस्तुत भजन की भाषा सधुक्कड़ी है । इसमें भोजपुरी , फारसी आदि के शब्दों की बहुलता है । भाषा सरल एवंम अपने भावों को व्यक्त करने में समर्थ है । भाषा व्यंग्यात्मक हैं और बड़ी चतुराई से संतो , ब्राह्मणों पर तीखा व्यंग किया गया है , और इनके आडंबरों और बाह्यचारों की खिल्ली उड़ाई गयी है  ।

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