IGNOU MHD - 02: आधुनिक हिंदी काव्य,
रोवहु सब मिलि के आवहु भारत भाई
IGNOU MHD 02 Free Solved Assignment
(1) निम्नलिखित काव्यांशों की संदर्भ व्याख्या कीजिए :- 12×3=36
(क)
रोवहु सब मिलि के आवहु भारत भाई।
हा! हा! भारत दुर्दशा न देखी जाई।।
सबके पहिले जेहि ईश्वर धन बल दीनो।
सबके पहिले जेहि सभ्य विधाता कीनो ।।
सबके पहिले जो रूप रंग रस भीनो।
सबके पहिले विद्याफल जिन गहि लीनो।
अब सबके पीछे सोई परत लखाई।
हा! हा! भारत दुर्दशा न देखी जाई।।
प्रसंग :-
प्रस्तुत पंक्तियाॅं हमारी पाठ्य पुस्तक "आधुनिक काव्य विविधा" के "भारत दुर्दशा" नामक कविता से लिया गया हैं। इसके रचयिता उच्च कोटी के कवियों में माने जाने वाले "भारतेन्दु हरिशचन्द्र" जी हैं। उनकी कविताओं में राष्ट्रीय जागरण तथा राष्ट्रीय चेतना का भरपूर समावेश मिलता हैं।
संदर्भ :-
"भारतेन्दु हरिशचन्द्र" भारत की वर्तमान दुर्दशा पर व्यंग्य करते हुए अत्यन्त सहज रूप से अंग्रेजो के औपनेवेशिक शोषण द्वारा दरिद्र हुए भारत की वर्तमान दशा को समाज के सामने उजागर किया हैं।
व्याख्या :-
कवि सामूहिक रूप से भारतीयों को भारत की वर्तमान दुर्दशा का संदेश देते हुए कहते हैं कि सभी भारतीयों को भारत की वर्तमान दुर्दशा पर चिंता करनी चाहिए, और अपने भारत की ऐसी दुर्दशा पर सभी भारतीयों को रोना चाहिए। कवि को भारत की ऐसी दशा देखी नही जा रही है, और वह उसकी ऐसी दुर्दशा पर रोना चाहते हैं। वह लिखते हैं कि जिस भारतवर्ष को ईश्वर ने सबसे पहले धन, बल से परिपूर्ण किया और जिसे सभ्यता रूपी विद्या दिया, उसी भारत की ऐसी हालत हैं, और जिस भारतवर्ष को ईश्वर ने सबसे पहले प्रकृति जैसे रुप रंग में डुबाए रखा। जिसे ईश्वर ने विद्याफल वाले गुणों से भरपुर रखा, आज वही हमारा प्यारा भारतवर्ष देश जो सभी गुणों से भरपुर था । वह आज सबसे पीछे हैं। कवि भारत की ऐसी दुर्दशा को देख नहीं पा रहे हैं, और वह भारत की ऐसी हालत पर रोना चाहते हैं, और साथ ही सभी भारतवासियों को रोने के लिए भी कहते हैं।
विशेष :-
(i) कवि ने इसमें रूपक अलंकार के प्रयोग के साथ ही लावनी छंदो का भी प्रयोग किया हैं।
(ii) कविता का मूल संदेश वर्तमान राष्ट्रीय जीवन को जाग्रत करना हैं।
(iii) कवि अपनी कविताओं में व्यंग्यात्मक शैली का प्रयोग करते हैं।
ख)
जो घनीभूत पीड़ा थी
मस्तक में स्मृति सी छायी
दुर्दिन में आँसू बनकर
वह आज बरसने आयी।
मेरे क्रन्दन में बजती
क्या वीणा, जो सुनते हो
धागों से इन आँसू के
निज करुणापट बुनते हो।
प्रसंग :-
प्रस्तुत पंक्तियाॅं हमारी पाठ्य पुस्तक "आधुनिक काव्य विविधा" के "ऑंसू" काव्यांश से लिया गया हैं। इसके रचयिता "जयशंकर प्रसाद" जी हैं। प्रसाद जी का जितना महत्व कवि के रूप में रहा हैं, एक गद्यकार के रूप में भी उतना ही महत्व रहा हैं। प्रसाद जी अपने जीवन के ही उत्पीड़ित पीड़ा को कविता के द्वारा लोगों के समक्ष उजागर किये हैं।
सन्दर्भ :-
कवि के हृदय में सृजन की दर्द और पीड़ा हैं। यह पीड़ा उनके काव्य में दृष्टिगोचर होती हैं।
व्याख्या :-
कवि निजी वेदना को व्यापक रूप देते हुए आंतरिक तनाव को छिपाते नहीं हैं। कवि के हृदय में करुणा के भाव और सृजन की पीड़ा हैं। कवि के हृदय में कोई घनीभूत पीड़ा फंतासी बनकर कवि के मस्तिष्क में छायी रहती हैं। वह फंतासी सृजन में नई अनुभूति के रूप में प्रस्तावित होती हैं। कवि के हृदय में दर्द और पीड़ा हैं, जो आँसू बनकर कवि की ऑंखों से बरसने वाली है, अर्थात कवि के हृदय में वियोग की पीड़ा हैं, जो बीते समय की यादगार बनकर उनके हृदय में छायी हुई हैं, वही दुख, दर्द, पीड़ा उनके हृदय रुपी मन में आज आँसू बनकर बरसने वाली हैं। कवि कहते है कि पीड़ा से कल्पित हृदय में विलाप से बजती हुई वीणा को क्या तुम सुन सकते हो ? कवि का कहना है कि आँसू रूपी धागों से हम करुणा रुपी वस्त्र को बूनते हैं, अर्थात पीड़ा से विकल्पित कवि के हृदय से निकली हुई आँसू से हम दया रूपी वस्त्र को बना रहे हैं। आँसू ही हमारे भावों की उपज हैं। मनुष्य का हदय भाव के बिना अधूरा हैं। भाव ही मानव को निराशा से जूझने की शक्ति प्रदान करते हैं। सृजन अनुभव की उपज है इसलिए आँसू भावों के उत्तम सृजन हैं। कवि ने अपने हृदय के वीणा और ऑंसुओं को खुद ही धागों में फिरोया हैं। कवि अपने जीवन के घोर निराशा के क्षणों में भी आशा को नहीं खोता हैं। इस संघर्ष के बल पर ही वह लोगों को सुन्दर संदेश देना चाहता हैं।
विशेष :-
(i) 'ऑंसू' के छंद में प्रवाह हैं। भावो से छंद का तार जुड़ जाने से यह प्रवाह आया हैं।
(ii) 'ऑंसू' कविता के छन्द प्रयोग में तराश और दीप्ति की झलक हैं।
(iii) "करुणापट" में रूपक अलंकार का प्रयोग हुआ हैं।
(iv) पीड़ा की गहराई को व्यक्त करने के लिए प्रसाद जी द्वारा "घनीभूत" शब्द का प्रयोग हुआ हैं।
(ग)
विजन-वन-वल्लरी पर
सोती थी सुहाग-भरी - स्नेह-स्वप्न-मग्न-
अमल-कोमल-तनु तरुणी - जुही की कली,
दृग बन्द किये, शिथिल - पत्राङ्क में,
वासन्ती निशा थी;
विरह-विधुर-प्रिया-संग छोड़
किसी दूर देश में था पवन
जिसे कहते हैं मलयानिल।
प्रसंग :-
प्रस्तुत पंक्तियाॅं हमारी पाठ्य पुस्तक "आधुनिक काव्य विविधा" के "जुही की कली" कविता से अवतरित हैं। जिसके रचयिता छायावाद के प्रमुख लोकोन्मुखी, सामाजिक चेतना के परिचायक "निराला जी" हैं। हिन्दी कविता में मुक्त छंद का प्रवर्तन करने का श्रेय भी निराला जी को ही जाता हैं।
संदर्भ :-
महाकवि निराला जी ने "जुही की कली" एंव पवन का मानवीकरण करते हुए मलयानिल रूपी प्रेमी के विरह में जुही की कली रूपी वर्णनों की स्थिति का सजीव चित्रण किये हैं।
व्याख्या :-
"जुही की कली" विजन वल्लरी पर एक सुहागिन की भाँति स्नेह और परिणय के स्वप्न में डूबीं एक तरुणी की भाँति सो रही थी। वह जुहीं की कली कोमल, अमल और प्रिय मिलन की आशा में व्याकुल हैं। तरुणी के स्वभाव गत लज्जा से वह अपने ऑंखों को बन्द किये हुये पत्तों की गोद में छिपी हुई हैं। वसन्त ऋतु की शीतल हवा में वह घूम रही हैं। विरह वेदना से व्याकुल हैं। मलयानिल जुही की कली से दूर है, वह विरह व्यथा से व्याकुल विधुर अपनी प्रेमिका के वियोग से वह अपने प्रेमिका की ओर आगे बढ़ता है, और अपने प्रेमिका को प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील होता हैं। अपनी प्रेयसी से मिलन की अनुभूति स्मरण आते ही मलयानिल काम से प्रेरित हो उठता हैं। वह मर्यादाओं - बधाओं को पार करता हुआ उस उपवन में पहुंचता है जहाँ जुही की कली उसकी प्रतिक्षा में उपवन की लताओं में छिपी हुई थीं।
इसमें कवि ने जुही की कली और मलयानिल के माध्यम से आत्मा और परमात्मा के सम्बन्ध को निरूपित किया हैं। आत्मा परमात्मा के मिलन के लिए व्याकुल हैं। वह सभी बन्धनों मर्यादाओं और सीमाओं को त्याग कर अपने प्रियतम की ओर अग्रसर होती हैं, और अपने प्रियतम को प्राप्त कर अपने आप को सफल बनाती हैं।
विशेष :-
(i) कवि ने रूप, रस, गंध और स्पर्श के ऐंट्रिय बिबों का प्रयोग किया हैं।
(ii) उपमा और रूपक अलंकार का प्रयोग हुआ हैं।
(iii) 'जुही की कली' छंद मुक्त रचना हैं।
(iv) कवि निराला जी ने "जुही की कली" एंव पवन का मानवीकरण कर वियोग के श्रृंगार पक्ष को बड़े ही सजीव ढंग से प्रस्तुत किया हैं।
(v) इस कविता में छायावादी प्रभाव दिखाई देता हैं।
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