IGNOU MHD - 02: आधुनिक हिंदी काव्य,
जयशंकर प्रसाद की काव्यभाषा और काव्यशिल्प
IGNOU MHD 02 Free Solved Assignment 
उत्तर-
प्रसाद की काव्यभाषा:-
प्रसाद ने अपनी काव्ययात्रा ब्रजभाषा से शुरू की। ब्रजभाषा से खड़ी बोली तक और इतिवृतात्मक अनगढ़ खड़ी बोली से रचनात्मक संवेदना सम्पन्न, रागसमृद्ध, लाक्षणिक, चित्रमय, ध्वनिमय काव्य-भाषा तक प्रसाद का विकास हुआ हैं।
प्रसाद की काव्यभाषा में नयी अलंकृति को नये सादृश्य साधर्म्य सम्बन्ध को, उसमें निहित नयी चमक को समझने की दृष्टि विचारणीय हैं। प्रसाद की काव्यभाषा को संगठित करने वाले उपादानों - बिम्ब, प्रतीक, मिथक, सादृश्य विधान को समझ सकें और उनके आधार पर प्रसाद की काव्यभाषा के समग्र आर्कषण को संश्लिष्ट, आर्कषण को भी हृदयंगम कर सकें। प्रसाद की काव्य भाषा की समझ में शब्द का उनका अपना चुनाव सबसे अधिक सहायक हैं। प्रसाद का आर्कषण कोमल लयात्मक पदविन्यास में बराबर बना हैं। प्रसाद की मधुमयी प्रवृति ऐसे शब्दों के प्रयोग में अधिक रुचि लेती हैं। प्रसाद की कल्पना व्यंजक चित्रों की अभिव्यक्ति में दूर तक सहायक हैं। यह भाषा प्रगीतात्मकता के अनुकूल तो है ही साथ ही प्रसाद जी प्रबंध क्षेत्र में भी छायावाद की चित्रविधान और लाक्षणिक शैली की सफलता की आशा बंधा गये हैं। प्रसाद ने पुराने शब्दों को नया अर्थ, नया संस्कार दिया। अप्रचलित शब्दों में नयी चमक पैदा की, साथ ही अपने भावावेग प्रेरित लाक्षणिक शब्दों को नयी भंगिमा दी। यह अर्थपूर्ण अछूता बिम्ब देखें--
जलप्लावन के बाद अकेले बचे मनु का --
"एक विस्मृति का स्तूप अचेत
ज्योति का धुंधला सा प्रतिबिम्ब" ॥
प्रसाद के शब्द प्रयोगों की प्रकृति विचारणीय है, क्योंकि उन्हें 'शीतल दाह', 'शिथिल सुरभि', 'स्मितिमय चाॅंदनी' जैसे प्रयोग अधिक अर्थवान लगते हैं। विशेष प्रकार की आन्तरिक अनुभूति ही प्रसाद की काव्यभाषा के नयेपन के मूल में हैं।
(ⅰ) प्रसाद के काव्य बिम्ब:-
प्रसाद के काव्यबिम्बों के पीछे एन्ट्रिक अनुभवों की चेतना हैं। यह सौन्दर्यबिम्ब स्पष्ट रूप से वर्ण बिम्ब हैं।
"और उस मुख पर वह मुस्कान
रक्त किसलय पर ले विश्राम
अरुण की एक किरण अम्लान"
प्रसाद यहाँ अधरो की लाली में धुली हुई मुस्कान की हल्की लाली को एक दूसरे से अलगाते हुए सूक्ष्म सौन्दर्य बिम्ब की कल्पना कर सके हैं।
'ज्वालामुखी और माधवी रजनी' का विरोध प्रकट हैं। प्रसाद ज्वालामुखी की दाहकता को कम करने के लिए उसे विशेषणों से घेरते हैं। लघु और अचेत यह प्रसाद की अपनी कला है। स्वाद बोध का एक बिम्ब लाक्षणिकता की दृष्टि से विचारणीय हैं--
"पवन पी रहा था शब्दों को
निर्जनता की उखड़ी साॅंस"
'कामायनी' में प्रसाद के अग्नि संकेत आदिम बिम्ब की दृष्टि में सहायक हैं। कामायनी की काव्यवस्तु में पृथ्वी, आकाश, जल, अग्नि के विलक्षण संकेत हैं। मनु श्रद्धा के प्रथम मिलन का संकेत इस प्रकार हैं--
"दो काठो का सन्धि बीच
उस निभृत गुफा में अपने
अग्नि शिखा बुझ गई जागने
पर जैसे सुख सपने"
प्रसाद के बिम्बों में दृश्य संवेदना प्रधान हैं। प्रसाद की एक और विशेषता यह भी है कि वे अस्पष्टता लिये हुये धुॅंधले भावबोध के स्तर पर ही ग्राह्य होते हैं। "लज्जा सर्ग" में ऐसे बिम्ब एक पूरी श्रृंखला बनाते हैं।
"जो गूॅंज उठे फिर नस-नस में
मूर्च्छना समान मचलता सा
ऑंखो के साॅंचे में आकार
रमणीय रूप बन ढ़लता सा"
इन संकेतों के आधार पर आप प्रसाद की काव्यभाषा में बिम्बविधान की सार्थकता का अनुभव कर सकते हैं।
ii) प्रसाद के काव्य प्रतीक:-
बिम्ब और प्रतीक के अन्तर को कहा जाता है कि जब भावावेग प्रेरित कल्पना मन में एक सहज स्फूर्त बिम्ब तात्कालिक चित्र उपस्थित करती है तो वह 'बिम्ब' होता हैं। मूर्तता बिम्ब का गुण है, पर वह अनेकार्थक, अस्पष्ट हो सकता है, यह बिम्ब जब बार-बार उसी अर्थ में दुहराया जाता है, और लगभग रुढ़ एकार्थक हो जाता है, तब वही प्रतीक कहलाता हैं। अप्रस्तुत संकेत अधिकतर प्रतीक के रूप में ही आते हैं। जैसे-- सुख, आनंद, प्रफुल्लता, यौवन की व्यंजना के लिए "उषा" प्रभात प्रतीक रूप में आते हैं।
जैसे ऑंसू में----
"झंझा झकोर गर्जन है
बिजली है नीरद माला
पाकर इस शुन्य हृदय को
सबने आ डेरा डाला"
'झंझा' झकोर' - आकुलता का प्रतीक हैं। 'गर्जन' वेदना की तड़प का प्रतीक हैं। प्रसाद की कामायनी में मनु, श्रद्धा, इड़ा तो प्रतीक है ही देव सभ्यता, सारस्वतनगर, हिमालय, कैलास, प्रलय, संघर्ष आदि भी प्रतीक की तरह प्रयुक्त हुए हैं।
(iii) प्रसाद की भाषा और मिथकीयता:-
मिथ या मिथक पौराणिक कल्पना हैं। मिथक का आधार जातीय स्मृति और विश्वास होते हैं। मिथकीय कल्पना कविता के लिए तभी उपयोगी होती है, जब कवि जातीय विश्वास में एक तरह का हस्तक्षेप करता हैं। प्रसाद 'मिथ' को सामूहिक चेतना से ही सम्बद्ध मानते है, पर वे भी मिथक को काव्योपयोगी बना पाते है- मिथ का व्यक्तिगत स्पर्श देकर।
श्रद्धा मनु की कथा 'कामायनी' में मिथकीय कल्पना भाषा में अवश्य ही कुछ नया जोड़ पाती हैं।
"कुंकुम का चुर्ण उड़ाते से, मिलने को गले ललकते से ।
अंतरिक्ष के मधु उत्सव के, विद्युत कण मिले झलकते से" ॥
यहाँ मिथ का नयापन ही प्रसाद की कल्पना में नये मिथक रचनी हैं। ऐसे मिथक भी पुराने मिथकों के सम्पर्क में अर्थ प्राप्त करते हैं।
(iv) सादृश्य विधान और प्रसाद की काव्यभाषा की बनावट:-
प्रसाद की काव्यभाषा में सादृश्य विधान पद का प्रयोग व्यापक अर्थ में हुआ हैं। छायावादी कवि अलंकार को चमत्कार तक की नयी परिभाषा करते हैं। पंत, पल्लव की भूमिका में कहते है-- अलंकार केवल वाणी की सजावट के लिए नहीं, वे भाव की अभिव्यक्ति के विशेष द्वार हैं। प्रसाद ने कल्पना के बल पर ही सादृश्य विधान के असंख्य नये रूप दिखाई देते हैं, जिनसे प्रसाद के कवि स्वभाव का और साथ ही उनकी क्षमता का भी पता चलता हैं। "झरना" में किरण के लिए प्रसाद की कल्पना हैं---
"धारा पर झुकी प्रार्थना सदृश।
मधुर मुरली सी फिर भी मौन"!!
'ऑंसू' प्रसाद की प्रसिद्ध कल्पना है--
"जीवन की जटिल समस्या
है बढ़ी जटा सी कैसी
या मादकता से आये तुम
संज्ञा से चले गए थे"
प्रसाद का सादृश्यविधान रागबोध से विस्तार की सूचना देता है। 'विस्मृति का स्तूप अचेत' इसी का उदाहरण है- प्रसाद काव्यगत अनुभूति को तीव्र और मूर्त बनाते हैं- नये सादृश्यविधान से, प्रसाद की सादृश्यविधान की विशिष्टता बिम्ब, प्रतीक, मिथक, फैन्टेसी के प्रयोग में मिलती हैं।
प्रसाद का काव्य शिल्प:-
प्रसाद की काव्यशैली या काव्यशिल्प के साथ ही भाषायी विशेषताओं को भी शैली के अंग के रूप में देख सकते हैं। पहले भाषा, वैशिष्ट्य की चर्चा शैली के अंन्तर्गत ही की जाती थी। इस दृष्टि से लाक्षणिक, चित्रात्मक भाषा का वैशिष्टय शैली का ही वैशिष्टय हैं। प्रसाद कहते है-- "काव्य में जो आत्मा की मौलिक अनुभूति की प्रेरणा है, वहीं सौन्दर्यमयी और संकल्पात्मक होने के कारण अपनी श्रेय स्थिति में रमणीय आकार में प्रकट होती है"। यह रमणीय आकार ही शैली विशेष हैं।
(i) प्रसाद के काव्य रूप:-
प्रसाद के काव्यरुपों की नवीनता छायावादी काव्य-शैली के अन्तर्गत नयेपन का आभास कराते हैं। नये छंद विधान का परिचय देती हुई या लोकछंदो का नया संस्कार ग्रहण करती हुई "कामायनी" का एक गीत---
"तुमुह कोलाहल कलह में
कह हृदय की बात रे मन
विकंल होकर नित्य चंचल
खोजती जब नींद के पल
चेतना थक सी रही तब
मैं मलय की बात रे मन "
कोमल पद विन्यास, वाक्य विन्यास, वाक्य लय इनके साथ ही प्रगीतात्मकता की नयी पहचान बनती हैं। किसी अज्ञात नियम से भी छायावादी रुपविधान की नवीनता का पता चलता हैं।
" वे कुछ दिन सुन्दर थे,
जब सावन-घन सघन बरसते।
इन आँखों की छाया भर थे,
सुरधनु रंजित नव जलधर से"।।
छायावादी प्रगीतात्मक कविताओं में लम्बी कविताऐं इस प्रकार है---
"थके हुए दिन के निराशा भरे जीवन की
सन्धना है आज भी तो धूसर क्षितिज में"।
(ii) छंद और छंद मुक्ति:--
छायावादी कवियों ने छंद के भीतर ही छंद्मुक्ति का प्रयास किया या मुक्त छंद का प्रयोग किया। मुक्त छंद भी छंद हैं। प्रसाद ने जहाॅं मुक्त छंद का प्रयोग किया है, वहाँ भी प्रगीतात्मकता का रूप मिलता हैं। प्रसाद के यहाँ छंद और मुक्त छंद स्थिति देखें जहाँ वाक्य छंद की इकाई हैं। गद्य-पद्य सभी में एक तरह का छंद होता है, जो वाक्य की गति लय में ही छिपा रहता हैं। नामवर सिंह कहते है कि "छायावादी कवि के जिस हृदयस्पन्दन ने वाक्यविन्यास को प्रभावित किया, उसी ने वाक्यविन्यास के माध्यम से छंदविधान का भी निश्चय किया। छायावादी छंदो में से अधिकांश का निश्वय प्रगीत भावना ने किया"।
प्रसाद ने फारसी बहर में भी कविताएँ लिखी जैसे一
"न छेड़ना उस अतीत स्मृति के खिचें हुए वीन तार कोकिल"
रोला छंद का प्रयोग : (संघर्ष सर्ग से)
'श्रद्धा का था स्वप्न किन्तु वह स्वप्न बना था'
ऑंसू छंद में,
"रो रोकर सिसक-सिसककर कहता मैं करुण कहानी"
प्रसाद का योगदान यह है कि उन्होंने पुराने छंदों का, लोकछंदों का नया उपयोग किया। जहाँ तक 'प्रलय की छाया' जैसी कविताओं के मुक्त छंद का प्रश्न है, वहाँ भी प्रगीतात्मकता तथा नाटकीयता का सन्निवेश ही मुक्त छंद को सार्थक बनाता हैं। प्रसाद का छंद संगठन प्रगीतों में तो महत्वपूर्ण है ही उनके मुक्त छंद सम्बन्धी प्रयोग भी उतने ही महत्वपूर्ण है, वहाँ भी छंद का मूल आधार लिया गया हैं। प्रसाद ने लोकछंदो के पून: संस्कार से भी नयी काव्यात्मक सार्थकता सिद्ध की हैं। प्रसाद जिस प्रकार प्रगीतात्मकता में खास नयापन लाते है, उसी प्रकार महाकाव्यात्मकता की नयी पद्धति या शैली विकसित करते हैं।
(iii) छंद, लय और संगीत:--
प्रसाद का अपना भाषा संगीत है, जो छंद के बहुरूपात्मक प्रयोगों में देखने योग्य हैं। प्रसाद के नाटय गीतों में संगीत और लय का विन्यास 'भाषा और रूप' दोनों को प्रभावित करने वाला हैं। प्लेटों ने कविता को संगीत के अंतर्गत मान्यता दी, यह बात प्रसाद को 'काव्य और कला' निबंध में अलग से विचारणीय लगती है, पर प्रसाद ही कहते है-- "संगीत के द्वारा मनोभावों की अभिव्यक्ति केवल ध्वन्यात्मक होती हैं। वाणी का संभवतः वह आरंभिक स्वरूप हैं" इस दृष्टि से वह कविता की जगह लेने वाली विद्या नहीं है। कविता का स्थानापन्न नहीं है, पर कविता को जीवन देने में कविता की गूंज को जिलाये रखने में प्रसाद जी का बड़ा महत्व हैं।
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