व्याख्या:- कहाँ आज वह पूर्ण पुरातन, वह सुवर्ण का काल? [kahaan aaj vah poorn puraatan, vah suvarn ka kaal?] (आधुनिक हिंदी काव्य) IGNOU MHD 02 Free Solved Assignment

IGNOU MHD - 02: आधुनिक हिंदी काव्य,
कहाँ आज वह पूर्ण पुरातनवह सुवर्ण का काल?
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 1. निम्नलिखित काव्यांशों की संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए : 12×3=36

 

कहाँ आज वह पूर्ण पुरातन, वह सुवर्ण का काल?

भूतियों का दिगंत छबिजाल

ज्योति चुंबित जगती का भाल?

राशि-राशि विकसित वसुधा का वह यौवन विस्तार?

स्वर्ण की सुषमा जब साभार 

धरा पर करती थी अभिसार

प्रसूनों के शाश्वत श्रृङ्गार 

(स्वर्ण भृङ्गों के गंध-विहार

गूँज उठते थे बारंबार 

सृष्टि के प्रथमोद्गार 

प्रसंग:-

प्रस्तुत पंक्तियाॅं हमारी पाठ्य पुस्तक "आधुनिक काव्य विविधा" के "परिवर्तन" नामक कविता से लिया गया हैं। इसके रचयिता सुमित्रानन्दन पन्त जी हैं। जिन्हे पद्मभूषण, अकादमी और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

सन्दर्भ:-

प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानन्दन पंत जी ने अपने "परिवर्तन" कविता के प्रारंभ में भारत के अतित के गौरव एंव गरिमा की प्रकृति के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं।

व्याख्या:-

पंत जी कहते है कि आज वह प्राचीन वैभव जो पूर्णता को प्राप्त था, तथा वह स्वार्णीय काल अर्थात धन, वैभव और सम्पन्नता से परिपूरित प्राचीन भारत आज कहाॅं हैं ? उन विभूतियों संपत्तियों के सौन्दर्य का जाल जो चारों तरफ फैला हुआ था। ज्योति पुंज से अलोकित संसार का मस्तक कहा जाने वाला भारत देश तथा अनेक प्रकार के परिसम्पत्तियों से विकसित सुशोभित इस पृथ्वी धरती के यौवन का विस्तार आज कहाँ अर्थात आज वह कुछ भी नहीं रह गया हैं।

 यह वह समय था, जब स्वार्णीम सौन्दर्य विनम्र या कृतज्ञता पूर्वक सम्पूर्ण पृथ्वी पर अपना विस्तार करती थीं। पुण्यों द्वारा निरन्तर शाश्वत इसका श्रृंगार होता रहता तथा उनके सुगंध पर स्वार्णीय और विधर करके अर्थात अजायमान होते रहते थें। उनका बार-बार गुंजित होना ऐसा लगता था मानों सृष्टि का वह पहला उद्गार है, अर्थात ऐसा लगता था कि सृष्टि का प्रथम उद्गार इस भारत-भूमि पर ही हुआ था। अतः कवि इस निष्कर्ष पर पहुॅंचता है कि परिवर्तन ही जीवन का सत्य है और परिवर्तन इस सृष्टि के मूल में हैं।

विशेष:-

(i) "परिवर्तन" कविता में अतीत की वास्तविकता के प्रति असंतोष है, और परिवर्तन का आग्रह हैं।

(ii) पंक्तियों में दार्शनिक अनुभूति के लिए संश्लिष्ट बिंबों का प्रयोग भी मिलता हैं।

(iii) कविता में जीवन जगत के परिवर्तन के प्रति गंभीर सोच मिलती हैं।

(iv) "परिवर्तन" कविता में जीवन जगत के यथार्थ चित्रों का प्रतिबिंब हैं।

)

नदियाँ आतीं स्वयं, ध्यान सागर, पर, कब देता है

वेला का सौभाग्य जिसे आलिंगन में भरने को 

चिर-अतृप्त, उद्भ्रान्त महोदधि लहराता रहता है।

 वही धन्य जो मानमयी प्रणयी के बाहु-वलय में 

खिंची नहीं, विक्रम-तरंग पर चढ़ी हुई आती है।

हरण किया क्यों नहीं, माँग लाने में यदि अपयश था ?

प्रसंग:-

प्रस्तुत पंक्तियाॅं हमारी पाठ्य पुस्तक "आधुनिक काव्य विविधा" के "उर्वशी" नामक काव्य से उद्धृत हैं। इसके  रचयिता राष्ट्रीय सांस्कृतिक धारा के प्रतिनिधि कवि "रामधारी सिंह दिनकर" जी हैं। 

संदर्भ:- 

पुररुवा के पास स्वयं चलकर उर्वशी का आना पुररुवा के इस कथन को सुनकर कि उर्वशी को एक एक दिन स्वयं बैकुण्ठ / स्वर्गलोक / परलोक / इन्द्रलोक से इस लोक में अर्थात राजा पुरुवा के पास आना होगा।

 व्याख्या:-

जिस प्रकार नदियाॅं स्वयं सागर के पास चली आती है, किन्तु सागर उनका कोई ध्यान नही रखता अर्थात नदियाँ सागर द्वारा उपेक्षित रहती है, क्योंकि वे स्वंय चलकर उसके पास तक आई हो। उर्वशी कहती है कि यह बेला का सौभाग्य है कि चिरकाल से अतृप्त, उसके प्रेम में पागल, दिग्भ्रमित सागर इसे अपने बाँहों के आलिंगन में भरने के लिए लालायित रहता हैं।

 उर्वशी यह भी कहती है कि वह स्त्री (प्रेमिका) धन्य है, जो अपने सम्मानित / मर्यादित प्रेमी के बाँहों के घेरे में स्वयं उसके रूप यौवन के आर्कषण से खिंचकर नहीं बल्कि उसके पराक्रम रुपी के तरंगों पर चढ़कर उसके पास तक आती है, अर्थात वह उसे बल और पराक्रम द्वारा प्राप्त करता हैं।

 अतः उर्वशी पुररुवा से कहती है कि यदि आपको मुझे माॅंगकर लाने में अपना अपमान महसूस हो रहा था या आपके सम्मान को ठेस पहुॅंच रही थी तो मुझे बल और पराक्रम पूर्वक अपहरण करके लाना चाहिए था।

विशेष:- 

(i) कविता में उर्वशी के आत्मद्वंद का चित्र हैं।

(ii) भाषा मुख्यतः तत्सम प्रधान हैं।

(iii) उर्वशी काव्य की रचना नाटकीय शैली में हुई हैं। इसमें नाटक की तरह स्थान और दृश्य का संयोजन हुआ हैं।

)

इतने में अँधियारे सूने में कोई चीख गया है 

रात का पक्षी 

कहता है :

वह चला गया है

वह नहीं आयेगा, आयेगा ही नहीं 

अब तेरे द्वार पर। 

वह निकल गया है गाँव में शहर में

उसको तू खोज अब 

उसका तू शोध कर!

वह तेरी पूर्णतम परम अभिव्यक्ति

उसका तू शिष्य है (यद्यपि पाताल तक...) 

वह तेरी गुरु है 

गुरु है...

प्रसंग:-

प्रस्तुत पंक्तियाॅं  हमारी पाठ्य पुस्तक "आधुनिक काव्य विविधा" के "अंधेरे" में कविता से लिया गया हैं। इसके रचयिता गजानन माधव मुक्तिबोध जी हैं।

सन्दर्भ:-

कवि ने इन पंक्तियों में यह कहना चाहते है कि जीवन के अंधेरे कमरों से निकल कर आत्मज्ञान करने से ही सांसारिक अंधकार से मुक्ति पाया जा सकता हैं, और बताना चाहते है कि ज्ञान की सच्ची प्राप्ति बिना गुरु के नहीं हो सकता, अर्थात गुरु ही श्रेष्ट हैं। 

व्याख्या:-

प्रस्तुत काव्यांश में जिन्दगी के अंधेरे एंव निस्तब्ध कमरे में चीखने की आवाज का आभास होता हैं। यह कमरा आर्तनाद से परिपूर्ण है, चीख इतनी दर्दनाक एवं मर्मस्पर्शी है कि जीवन में सिंहरन उत्पन्न हो जाती हैं। रात का पक्षी (परमात्मा) यह संकेत करता है कि चीख करने वाली आत्मा इस दुनियाँ से विदा हो गई अब उसका आगमन पुनः नही होगा अर्थात समृद्धि, सुख एंव शांति रुपी पक्षी जीवन संसार सदा के लिए उड़ गया हैं। इसमें केवल दु:, संघर्ष, उत्पीड़न शेष रह गया हैं। बीते क्षण अब पुनः नसीब नहीं होंगे। अतः आत्म संघर्ष को छोड़कर सामाजिक संघर्ष का स्वप्न देखता हैं। वह गाँव, शहर सर्वत्र अपनी कोई रागनी की खोज करता है, अतः उसे अपनी पूर्णतम परम अभिव्यक्ति के लिए आत्मबद्धता से निकलकर समाज के मध्य जाना पड़ता है, और जन-जीवन को समझकर संघर्षात्मा संहानुभूति के माध्यम से भागीदार बनना पड़ता हैं।

संघर्ष ही जीवन है और ज्ञान एवं सफलता की पृष्ठभूमि है क्योंकि--

दु: दाना से नव अंकुर 

पाता जग जीवन का वन 

करुणार्द्र विश्व की गर्जन

बरसाती नव जीवन कर्ण (पंत)

अतः कवि उस पूर्णतम अभिव्यक्ति को शोध करने का परामर्श देता है, जिसका वह शिष्य हैं। पलायन उचित नहीं। गुरु शिष्य का सम्बन्ध अटूट हैं। गुरु के बिना ज्ञान और ज्ञान के बिना सही मार्ग पर चलना असंभव हैं।

"बिन गुरु ज्ञान होहि जग

 तेही बिन मोह भाग। (तुलसी

अतःआत्मज्ञान का खोजकर ही सांसारिक अंधकार से  मुक्ति पाया जा सकता हैं।

विशेष:-

(i) कविता के इस प्रसंग में भावहीन मनुष्य का बिंब उभरता हैं।

(ii) मध्यवर्ग के खोखलेपन के प्रति आक्रोश और व्यंग्य का भाव हैं।

(iii) कविता के इस पंक्तियों में आत्मसंघर्ष से आत्म साक्षात्कार की ओर, फिर जगत साक्षात्कार की प्रक्रिया का अत्यंत स्पष्ट संकेत मिलता हैं।

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