महादेवी वर्मा की काव्य संवेदना [mahaadevee varma kee kaavy sanvedana] (आधुनिक हिंदी काव्य) IGNOU MHD 02 Free Solved Assignment

IGNOU MHD - 02: आधुनिक हिंदी काव्य,
महादेवी वर्मा की काव्य संवेदना
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(2) महादेवी वर्मा की काव्य संवेदना पर प्रकाश डालिए ।  (16)

उत्तर:- महादेवी की काव्य संवेदना:-

छायावादी काव्य एक नई संवेदनशील का काव्य था। महादेवी वर्मा भी छायावाद की एक प्रतिनिधि हस्ताक्षर हैं। महादेवी वर्मा के संदर्भ में उनका व्यक्तित्व अपनी इंद्रधनुषी आभा लिए उनके काव्य लोक में उपस्थित होता हैं। उनकी जीवन दृष्टि मानवीय गुणों से सम्पृक्त और संवेदनाओं से अनुप्राणित हैं। उनमें उदात्त और गौरवमय भाव मिलते है, और समस्त प्राणी-जगत के प्रति उनकी करुणा उमड़ पड़ती हैं।

छायावाद युग भारतीय नवजागरण का काल था, जहाॅं सभी स्तरों पर मुक्ति के लिए संघर्ष सक्रिय था। नारी भी अपनी मुक्ति की खोज में रत थी। महादेवी में मुक्ति की उड़ान स्पष्ट, असीम और अनन्त हैं। उनमें नारी के अभिमानी रूप की अभिव्यंजना हुई हैं। महादेवी वर्मा  के गीतो में काव्य संवेदना का सहज ही प्रत्यक्षीकरण हुआ हैं। महादेवी जी अपनी काव्य रचनाओं में प्रायः अंतर्मुखी रही हैं। अपनी व्यथा, वेदना और रहस्य भावना को ही इन्होंने मुखरित किया हैं। महादेवी वर्मा का काव्य संवेदना इन चार स्तम्भों पर अवस्थित है-- वेदानुभूति, रहस्यभावना, प्रणय भाव और सौंदर्यानुभूति।

महादेवी की काव्य संवेदना की निर्मिति और विकास में उनके व्यक्तिगत एकाकीपन की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है, जिसकी वेदना विभिन्न आयामों में उनके काव्य में प्रकट हुई हैं। वेदना के विविध रूपों की उपस्थिति उनको काव्य जगत की विशिष्टता हैं।

(i)महादेवी की कविता में वेदना भाव:- 

महादेवी वर्मा की कविता मे दुःख और करुणा का भाव प्रधान हैं। वेदना के विभिन्न रूपों की उप‌स्थिति उनके काव्य की एक प्रमुख विशेषता है। वह यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं करती कि वह "नीर भरी दुःख की बदली हैं। उनके एक गीत की पंक्ति हैं--

"शलभ मैं शापमय वर हूँ ।

किसी का द्वीप निष्ठुर हूँ।।" 

महादेवी के पूरे काव्य पटल पर इस तरह के असंख्य बिम्ब बिखरे पड़े है, जिनसे उनके अंतस में पलती अथाह पीड़ा का स्पष्ट संकेत मिलता हैं। एक विचित्र का सुनापन, एक विलक्षण एकाकीपन बार-बार उनकी कविताओं में उमड़ता दिखाई देता हैं। पीड़ा का साम्राज्य ही उनके काव्य संसार की सौगात है---

साम्राज्य मुझे दे डाला। 

उस चितवन में पीड़ा का । 

विफल प्रेम का यह रुदन महादेवी के काव्य की अंतवस्तु हैं। यह पीड़ा ही कवियत्री की वेदना हैं--

" मेरी मदिरा मधुवाली, आकर सारी दुलका दी।

हॅंस कर पीड़ा से भर दी, छोटी जीवन की प्याली।।"

महादेवी की वेदना अनुभू‌तिजन्य होने के कारण उनकी कविताओं में इसकी अभिव्यक्ति भी अत्यंत सहज ढंग से हुई हैं। महादेवी अंतमुर्खी कवियत्री है, उनके अंतमुर्खी चिंतन में जहाँ विरह-मिलन, तृप्ति और अतृप्ति, आशा- निराशा की हल्की लहरियाॅं है, वहाँ करुणा और मानवता की अनगिनत ध्वनियाॅं भी मुखर हो उठी हैं। महादेवी की करुणा व्यक्तिपरक अथवा आत्मगत ही नहीं है, बल्कि बहिर्मुखी एंव समाजपरक भी हैं। उनकी वेदना प्राणि-मात्र के प्रति करुणा का रूप धारण करती है। उनके काव्य लोक में वेदना की परिणति आनंन्द में होती हैं। महादेवी ने अपने काव्य में दु:ख और वेदना का वरण तो स्वयं ही किया है वे कहती है-- हमारे असंख्य सुख हमें चाहे मनुष्यता की पहली सीढ़ी तक भी न पहुॅंचा सके, किंतु हमारा एक बूंद ऑंसु भी जीवन को अधिक मधुर बनाये बिना नही गिर सकता। महादेवी वर्मा अपनी कविताओं के माध्यम से दु:खी जनों में नई आशा, अमल, आनंद का संचार करती हैं। 

(ii) महादेवी की कविता में रहस्य भावना:-

महादेवी की कविता में रहस्य भावना विद्यमान थी। महादेवी और रहस्यवाद एक-दूसरे के पर्याय हैं। महादेवी स्वयं कहती है- हमारे मूर्त और अमूर्त जगत एक-दूसरे से इस प्रकार मिले हुए है कि एक यथार्थदर्शी दूसरे को रहस्यदृष्टा बनकर ही पूर्णता पाता हैं। महादेवी वर्मा एक रहस्यवादी कवि के रूप में केवल अद्वैतवाद से बंध कर नही चलती। वह प्रियतम के साथ एकाकार होने की इच्छा व्यक्त करती हैं---

"जो तुम आ जाते एक बार, कितनी करुणा कितने संदेश,।।

पथ में बिछ बाते बन पराग, गाता प्राणों का तार-तार,।।

अनुराग भरा उन्माद राग, आँसू लेते वे पग पखार।।"

इस प्रकार महादेवी वर्मा में रहस्यानुभूति के विविध रूपों के दर्शन होते है, कहीं मिलन की इच्छा, स्मरण, स्वप्न और साक्षात मिलन तो कहीं विरह का अनिवार्य चरण भी आता हैं। महादेवी की कविता में विरह की कमी नही बल्कि उनका समूचा काव्य ही विरह के रंग में रंगा हुआ हैं। महादेवी की रहस्यवादी अनुभूतियों में मुक्ति की तड़पन देश और जाति का ही नहीं, स्वयं का भी हैं। उनकी रहस्यानुभूति उन्हें मानव समाज के उपेक्षित शोषित वर्ग के कल्याण के प्रति भी सजग करती हैं।

महादेवी की कविताओं में रहस्यवाद की सृष्टि होती हैं। अज्ञात प्रिया से मिलनाकांक्षा, उससे न मिल पाने की वेदना को ही अपना मूल धन मान लेना, विरह में ही अपने को 'चीर' बनाए रखने का विश्वास आदि महादेवी को मीरा की तरह चीर विरहिणी का रूप प्रदान करते हैं। इन्हें चीर विरहणी बने रहने में ही संतोष प्राप्त होता हैं। कवियित्री कहती है दुख मेरे निकट जीवन का ऐसा काव्य है, जो सारे संसार को एक सूत्र में बांध रखने की क्षमता रखता हैं।

इस तरह महादेवी छायावादी रहस्यवाद की प्रतिनिधि हस्ताक्षर हैं। उनमें रहस्यानुभूति के प्रत्येक चरण की अभिव्यक्ति मिलती हैं। वह प्रकृति व्यापार में एक विराट  सत्ता के दर्शन करती और उसके साथ रहस्यात्मक संबंध  स्थापित करने को आतुर रहती हैं, किन्तु उन्हें यथार्थ विरोधी रहस्यलोक में रहना कभी स्वीकार नहीं हुआ। वह अपनी संवेदनाओं को शोषित- उपेक्षित वर्ग से जोड़कर चली। उन्होंने अपने युग की मुक्ति आकांक्षा को अपनी  रहस्यानुभूति में स्थान दिया हैं।

(iii) महादेवी की कविता में प्रणय की अनुभूति:-

महादेवी की कविताओं में प्रणय की अनुभूति को महत्वपूर्ण स्थान मिला हैं। महादेवी के काव्य में प्रेम एक मूल भाव के रूप में प्रकट हुआ है, तथा उनका प्रेम अशरीरी हैं। यह करुणा से अप्लावित प्रेम हैं। अलौकिक दिव्य सत्ता के प्रति उनकी इस प्रणयानुभूति में दाम्पत्य प्रेम की झलक भी मिलती है, और लौकिक स्पर्श का अभास भी। महादेवी की कविता में व्यक्त प्रेम इसलिए भी विशिष्ट है, क्योंकि यह एक स्त्री की लेखनी से किया गया स्त्री मनोभावों का चित्रण हैं। उनमें स्त्रीयोचित लाज संकोच है तो अपने युग की नवजागृत नारी का अंह भी हैं। वह विरह की आग में तपती है तो संयोग की छाँह से भी स्वयं को दूर नहीं रखना चाहती। इस प्रकार उन्होंने प्रणय की विविध स्थितियों का भरपूर आनंद लेते हुए अपनी कविताओं में इनका गहन चित्रण किया हैं। यह प्रेम वासना रहित प्रेम है, जिससे उदात्तता का भाव प्रचुरता से मिलता हैं। महादेवी ने प्रेम के मधुर रूप का चयन किया हैं। उनका प्रेम प्राकृतिक सौंदर्य से अप्रभावित हैं। महादेवी ने प्रकृति के उपकरणों से जिस सौंदर्य के दर्शन किए, उसी से उनकी प्रणयानुभूति का उद्भव हुआ और विराट सौन्दर्य के प्रति वह अपने प्रणयोद्‌गार व्यक्त करती रही।

महादेवी की कविता में रहस्य भावना में ही हम उनकी प्रणयानुभूति के अनेक चरणों को जान चुके है, क्योंकि उन्होंने उस दिव्य विराट पुरुष को अपना प्रेम इष्ट मान कर उसके साथ माधुर्यमूलक रागात्मक संबंध की स्थापना की हैं। इसलिए उनकी प्रेमानुभूति और रहस्यानुभूति दोनों एक-दूसरे में रच बस गई हैं। यह रागात्मक संबंध इतनी गहनता और प्रगाढ़ता लेकर उपस्थित होता है कि उसमें दाम्पत्य प्रेम का संकेत मिलता है, जो स्वयं में प्रणय की पूर्णता का ही द्योतक हैं।

महादेवी भी यथार्थ में मिलन न होने पर स्वप्न के माध्यम से अनेक गीतों में अपनी प्रण्यानुभूति को व्यक्त किया हैं। उदाहरण---

"पलभर का वह स्वप्न तुम्हारी।

युग-युग की पहचान बन गया।।"

इस प्रकार प्रणय छायावादी कविता का एक महत्वपूर्ण अंग हैं। महादेवी वर्मा के काव्य का यह एक मूल भाव हैं। महादेवी की कविता में प्रणय की सभी स्थितियों का चित्रण मिलता हैं। उनका प्रेम अशरीरी है, किंतु उनमें लौकिक  प्रणय की अभिव्यंजना हुई हैं। उनके प्रणय का इष्ट वह  दिव्य परम पुरुष हैं। उनके प्रेम का उद्‌गम प्रकृति में है, जिसके विराट सौन्दर्य से प्रभावित होकर वह उसकी ओर आर्कषित होती हैं। वह आत्म समर्पण भी करती है, और अपने अभिमान को भी तिरोहित नहीं करती, महादेवी में स्त्री- सुलभ लाज संकोच भी है, और अपनी लघुता के प्रति गर्वानुभूति भी। विरह की वेदना में तो वह आकंठ डूबी हुई हैं। उनकी कविताओं में प्रणय की अभिव्यंजना अनुपम और अनुठी हैं।

(iv) महादेवी की कविता में सौंदर्य चित्रण:- 

महादेवी की कविताओं में सौंदर्य के विविध रूपों का मनोहर चित्रण हुआ हैं। सौंदर्य भावना भी छायावाद की एक प्रमुख प्रवृति थी। महादेवी ने अपनी कविताओं में सौंदर्य के सूक्ष्म रूप को चित्रित किया हैं। उनकी सौंदर्य दृष्टि प्रकृति और मानव दोनों की ओर आकृष्ट होती हैं।

महादेवी ने सर्वत्र एक विराट सत्ता के दर्शन किए हैं। इसी अरूप पुरुष का दिव्य सौंदर्य उन्हें आकृष्ट होता है, और वे उसी के चिर-सौंन्दर्य से प्रभावित होकर उसका गुणगान करती हैं। यह सौंन्दर्य उन्हें प्रकृति के प्रत्येक उपकरण, प्रत्येक उपादान में दिखाई देता हैं। इसलिए प्रकृति की सुषमा का वर्णन उनके संदर्भ में एक परम प्रिय के सौंन्दर्य का वर्णन ही हैं।

महादेवी क्योंकि प्रकृति के प्रत्येक रूप में उस दिव्य पुरुष के सौंदर्य के ही दर्शन करती है, इसलिए प्रकृति का कोई भी रूप उन्हें विचलित नहीं करता। महादेवी ने अपनी  व्यक्तिगत प्रणयानुभूति और वेदनानुभूति की अभिव्यक्ति के लिए भी प्रकृति के सौंन्दर्य का सहारा लिया। जो कुछ वह सीधे-सीधे अप्रत्यक्ष रूप में नहीं कह सकती थी। प्रकृति का आवरण ले लेने पर वही सब कुछ वह अत्यंत सहज, सरल ढंग से कह जाती हैं ।  उदाहरण----

"उड़-उड़ कर जो धूला करेगी, 

मेघों का नभ में अभिषेक। 

अमिट रहेगी उसके अंचल,  

में मेरी पीड़ा की रेख।।"

इस प्रकार हमने देखा कि महादेवी सौंदर्य की उद्‌भाविका हैं। उनके काव्य में दिव्य पुरुष, प्रकृति, नारी के माध्यम से सौंदर्य को अभिव्यक्ति मिली हैं। उनकी कविताओं में चित्रित सौंदर्य स्थूल न होकर सूक्ष्म और आंतरिक सौंदर्य हैं।

(v )सारांश:-

महादेवी वर्मा छायावाद की एक प्रतिनिधि हस्ताक्षर कवियत्री हैं। महादेवी की कविताओं में वेदना भाव, रहस्य  भावना, प्रणय की अनुभूति और सौंदर्य चित्रण की  भावनाओं से परिपूर्ण हैं।

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